आगोश

Annurag sharma(Administrator)

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डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश )


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आरक्षण की बुर्द ब्राह्मण पीछे क्योँ

Posted On: 31 Aug, 2015  
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वादे या कब्ज

Posted On: 10 Jul, 2015  
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जन्माष्टमी (दिव्य प्रकाश)

Posted On: 28 Aug, 2013  
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उबल रहा है भारत मेरा शहीदों की सहादत पर ,

Posted On: 9 Aug, 2013  
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आदमी की विवशता

Posted On: 15 Jun, 2013  
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कुछ होने वाला है

Posted On: 13 Jun, 2013  
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A ,B ,C ,D , I लव , यू ,

Posted On: 5 Jun, 2013  
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धन की देवी जब आती है

Posted On: 27 May, 2013  
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मिलावट का बाजार गर्म

Posted On: 24 Apr, 2013  
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सुन्दरी का स्वप्न

Posted On: 4 Mar, 2013  
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आदरणीय डॉ. हिमांशु शर्मा 'आगोश' जी, वर्तमान राजनीति और उसकी बड़बोला विसंगति पर अत्यंत दिलचस्प व्यंग्य आलेख; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! "ईश्वर नेताओं को सद्बुबद्धि दे ,अपने ऐसो आराम व राजमहल जैसे ठाटों से दूर रहकर वेतन ,भत्तों की मलाई चाटने से परहेज करें ।प्रत्येक चुनाव चुनाव मे नये -नये नेता फर्श से अर्श पर पहुँच जाते हैं ।अच्छे कार्य जनहित मे नेता करें तो नेताओं को केवल नेताओं की जय हो ,देवताओं जैसा सम्मान ही बहुत है। जनता की भलाई देश से प्यार जब नेता करते हैं तो जनता बार -बार वोट की भिक्षा देकर चुनाव जिताती है,पहले यह आदर्श स्वं ब्राह्मणों ने भारत को दिया था ,और सर्वोच्च कहलाये।"

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आदरणीय डॉ. साहब ,..सादर प्रणाम बहुत सुन्दर रचना ,.. गोधूली अभी भी उठती है ,..चरवाहे गीत नहीं गाते माँ लोरी अभी सुनाती है ,.. मट्ठा गुड़ लोग नहीं खाते खुशबू खेतों की जहर बन गयी,. जुगनू कैसे जिन्दा रहते अब मोर नाचते कम ही हैं ,..व्यभिचार भला कैसे सहते गाँवों को नजर लगी शहरों की ,सब ऊपर भागे जाते हैं खोकर जमीन ऊपर उड़ते ,झूठे सपने भरमाते हैं ,..........गाँव बहुत बदल गए हैं ,...अब वाकई दुःख होता है ,..अपनत्व कम हुआ है लेकिन अभी भी बहुत है ,..खुशबू जहरीली हुई तो क्या !....सोंधापन तो है ,.....प्रकृति का क्षरण हुआ है ,.फिर भी मौजूद है .............चारागाह नहीं हैं लेकिन चरवाहे हैं ,.....कबड्डी -गुल्ली डंडे की जगह अब ताश के पत्तों ने ले ली है ,........यादें दिलाती सुन्दर रचना के लिए बहुत आभार

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

आदरणीय आगोश जी, सादर ! अभी आपको सूर्पनखा के जन्म लिए जाने के सम्बन्ध में संदेह ही है ! हरी-हरी ! सूर्पनखा तो जन्म लेकर जवान भी हो चुकी है ! उसके नखरों से सारा भारत त्रस्त है ! उसकी तृष्णा की ज्वाला में कितने बालक, वृद्ध, नर, नारी, कालकवलित हो गए, अपने परिवार को भी उसने नहीं छोड़ा, घोटाले पर घोटाला करने के बाद भी कोई उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ पा रहा है ! उसके चेले-चांटी दुर्दमित अट्टहास कर जनता का दिल दहला रहे हैं ! जनता रो रही है, जनतंत्र रो रहा है, वन-नदी-पर्वत सब दुखी हैं, सम्पूर्ण भारत दुखी है, और अभी आपको सूर्पनखा के जन्म लिए जाने के सम्बन्ध में संदेह ही है ! अब तो उसके वध का समय आ गया ! रणभेरी बज गई है ! शंखनाद सम्पूर्ण देश में गूंजित हो रहा है ! उचित अवसर की प्रतीक्षा है !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

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